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रविवार, 8 नवंबर 2015

तैलंग स्वामी 3

प्रारब्ध
       काशी में भवानी प्रसाद ‘ वाचस्पति ’ एक सज्जन थे जो एक अरसे से काला ज्वर का कष्ट भुगत रहे थे | शारीरिक तथा मानसिक कष्ट से पीड़ित थे | मित्रों के सुझाव पर तैलंग स्वामी के पास आये और कष्ट से मुक्ति पाने की प्रार्थना करने लगे |
       सारी बातें सुनने के बाद बाबा ने कहा – “ चलो जरा भांग पीसो |”
       वाचस्पति महाराज सील लोढ़ा ले कर भांग पीसने लगे | पीस जाने के बाद बाबा ने मटर के बराबर भांग की गोली देते हुए कहा – “ इसे खा जाओ | कल से रोज इसी समय आना | यहाँ तुम्हे भांग पीसना तथा खाना पड़ेगा |”
       वाचस्पति बाबा के इस आज्ञा को सुन कर स्तम्भित रह गये | उन्हें यह तो मालूम था कि बाबा लोग भांग गांजे का सेवन करते हैं , किन्तु यह क्या जो नहीं खाते उन्हें भी खिलाते है ! अब वे नित्य आते , भांग पीसते , मटर के बराबर गोली खा कर घर चले जाते थे | यह क्रम लगातार एक माह तक चलता रहा | एक दिन जब वाचस्पति आये तब बाबा ने कैं कर दी | इसके बाद वाचस्पति से कहा गया कि वे  इस जगह को साफ़ कर दें |
       आदेश के अनुसार बिना हिचक के सर्वत्र उन्होंने स्थान को साफ़ कर दिया | बाद में भांग पीसने का कार्यक्रम चालू हुआ |

       इसी प्रकार बाबा ने एक दिन काफी मात्रा में टट्टी कर दी | वाचस्पति को आने पर सफाई करने को कहा गया | इस बार भी उन्होंने बिना हिचके सफाई कर दी | इसके बाद भांग पीसी और खाई गयी |
       इस घटना के दुसरे दिन बाबा ने भांग की गोली खिलाने के बाद कहा – “ अब कल से तुम यहाँ मत आना |”
-    “ क्यों बाबा |”
बाबा ने कहा – “ चार दिन बाद तुम पूर्ण स्वस्थ हो जाओगे | इसी कष्ट के लिए तो तुम यहाँ आते रहे |”
चार दिन बाद वाचस्पति पूर्ण स्वस्थ हो गये |
कभी कभी हमे प्रारब्ध ( पूर्व जन्म ) के कष्ट भुगतने पड़ते हैं , किन्तु किसी सिद्ध की कृपा से उसे भी समाप्त किया जा सकता है |
       साभार – विश्वनाथ मुखर्जी के पुस्तक से प्राप्त

नोट : भांग खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है |

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

तैलंग स्वामी – 2

हरिश्चन्द्र घाट स्थित श्मसान काशी का प्राचीन श्मसान है | चौक स्थित महाश्मसान के आस पास बस्तियां बस जाने के कारण मणिकर्णिका घाट पर प्राचीन श्मसान आ गया था | यही वजह था कि बाहर से आने वाले अधिकांस शव हरिश्चन्द्र घाट पर आने लगे |
       एक दिन ब्रह्मा सिंह को साथ ले कर तैलंग स्वामी श्मसान की ओर आये | कुछ देर बाद अनेक लोग एक शव को ले कर किनारे पर उतरने लगे | शवयात्रियों के पीछे एक महिला जोर जोर से रोती  हुई आ रही थी |ज्यों हीं शव को लोगों ने श्मसान भूमि पर रखा , त्यों हीं उक्त महिला उस शव  से लिपट गई | बहुत हीं मुश्किल से उक्त महिला को शव से अलग किया गया |
       स्वामी जी ने ब्रह्मा सिंह को शव यात्रियों के पास घटना की जानकारी के लिए भेजा तो पता लगा कि मृत व्यक्ति की पत्नी शव के साथ सती होना चाह रही है | नि:संतान ब्राह्मणी है | दूसरी जाती की होती तो पुनर्विवाह कर लेती |

       सारी बातें सुन लेने के बाद स्वामी जी उक्त महिला के पास आये | उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले “ –शांत हो जा बेटी |”
       स्नेह भरे इस स्वर को सुनते हीं महिला ने एक बार स्वामी जी की तरफ देखा और फिर उनके चरणों में सिर रखते हुए बोली – “मैं अब जीना नहीं चाहती | बाबा जी आप इन लोगों को समझाइये | अब मैं किसके लिए जियूं ?”
       स्वामी जी ने कहा –“ मेरा पैर तो छोड़ तुझे तो अभी जीवित रहना है | पति की सेवा करनी है |”
       पति की सेवा करनी है सुनते हीं उस स्त्री ने चीख कर पूछा “ क्या ?”
       उपस्थित लोग विस्मय से बाबा को देखने लगे | तभी तैलंग स्वामी ने शव के नाभि स्थल में पैर का अंगूठा लगा दिया | क्षण भर बाद लाश कुनमुनाने लगी | स्वामी जी ने कहा – “ इसके बंधन खोल दो |”
       लोग शव के बंधन खोलने लगे शेष लोग चकित दृष्टि से शव को जीवित होते देखने में लगे रहे | स्वामी जी चुपचाप अन्तर्धान हो गये | महिला , जीवित ब्राह्मण तथा साथ आये लोगों में से कोई भी अपनी कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सका |
       संत चाहे तो मुर्दा भी जीवित हो जाता है इसमें कोई संदेह नहीं |

तैलंग स्वामी के चरणों में नमन _/\_
साभार : विश्वनाथ मुखर्जी के पुस्तक से प्राप्त |

परावलंबन निषेध ध्यान |

आराम से सुखासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी हो तनी हुई नहीं | निचे बैठने के लिए कोई आसन बिछा लें सूती ऊनी   या कुश का कुछ भी   | ...