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शनिवार, 4 मार्च 2017

ध्यान स्वयं को बदलने का रसायन है


आप कहतें हैं हैं ध्यान करना चाहता हूँ किन्तु ध्यान नहीं लगता | अब इस पर मनन करें ये कौन चाह रहा है की ध्यान करूँ और ये किसके कारण ध्यान नहीं लगता | ये ध्यान चाहने वाला आपका आत्मा है और मन के द्वारा व्यक्त हो रहा है मन के द्वारा व्यक्त होना इसकी मजबूरी है क्यूंकि वर्तमान में आत्मा के पास अभियक्ति का साधन नहीं है मन के सिवा | जब व्यक्ति आत्मज्ञानी हो जाता है ब्रह्मज्ञानी हो जाता है तो आत्मा अपने आप को रोंवें रोंवें से अभिव्यक्त करने लगती है | किसी ब्रह्मज्ञानी के समीप बैठ कर देखें | आप कहते हैं ध्यान नहीं लगता ध्यान कौन नहीं लगने दे रहा है ये आपका मन हीं ध्यान नहीं लगने दे रहा दूसरा कोई बाधक नहीं है |
 जब मन ध्यान में रोड़े अटकाए तब मन को अनुशासन से संयमित करें ( अथ योगानुशासनम ) | अनुशासन योग का | और योग क्या  योगशचितवृतिनिरोध:  मन के वृतियों यानि मन के स्वाभाव को रोकना योग है | तो मन के स्वाभाव को कैसे रोकें दृढ संकल्प से | संकल्प करें ध्यान करने का चाहे मन बार बार भटके किन्तु प्राण प्राण से संकल्प करें की आज ध्यान लगा कर हीं दम लूँगा मन को इधर उधर नहीं भटकने दूंगा बल्कि मन को जोर जबरदस्ती से हीं सही ध्यान कि ओर प्रेरित करूँगा | बार बार प्रयास से मन ध्यान कि ओर प्रेरित होने लगेगा निश्चित हीं |
आपका मन ध्यान के लिए प्रेरित हो ऐसा परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ |

ॐ 

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

देवरहा बाबा के चमत्कार 19

मेरा नाम ले कर
बात  1983 की है | अखौरी केदारनाथ छपरा में डाक विभाग के अधीक्षक थे | विजयदशमी के दिन वे खा पी कर रात में सो गये | उनका रसोइया अर्दली ( चपरासी ) के साथ शहर में उत्सव देखने चला गया | आधी रात के बाद वे दोनों लौट आए और घबराते हुए स्वर में दरवाजा खोलने के लिए आवाज़ देने लगे | केदारनाथ की नींद खुल गयी | दरवाजा खोल कर बाहर आये – “ कहो क्या बात है |”
-    “ तलवो के भीतर बहुत तेज दर्द है  , लगता है अभी प्राण निकल जायेंगे | जोर जोर से बेधता है |” अर्दली ने रोते हुए कहा | रोने की आवाज सुन कर केदारनाथ की पत्नी और छोटा भाई दोनों बाहर आ गये | गर्म तेल मलवाया गया किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ | दर्द की बेचैनी बढती गयी | दर्द के मारे आदमी चीखने लगा | केदारनाथ की पत्नी ने कहा – “ बाबा का ध्यान कीजिये |इस कुबेरा (असमय)में वे हीं कुछ कर सकते हैं |”
-    “ प्रसाद है ?”
-     “ जी हाँ है |”
-    “ थोडा प्रसाद इसे खिला दो मैं बाबा का ध्यान करता हूँ | उनकी कृपा हो तो इसकी मर्मान्तक पीड़ा दूर हो जायेगी |”

केदार नाथ ध्यान में लग गये | प्रसाद खा कर अर्सली को थोड़ी राहत मिली | एक घंटे के भीतर दर्द की लहर घट गयी | वेदना की तीव्रता कम हो गयी | उसकी रुलाई बंद हो गयी |
केदारनाथ के छोटे भाई ने अर्दली को रिक्सा से अस्पताल पहुंचाया | उतनी रात को कौन डॉक्टर डेरा पर देखने आता | अस्पताल में भी कोई निदान नहीं हो सका | सुबह जांच करने की बात तय  हुई |लेकिन सुबह जांच करने की नौबत हीं नहीं आई | अर्दली सुबह होते होते तक में बिलकुल ठीक हो गया और काम करने लगा | बाबा के प्रसाद ने हीं उसके कष्ट हर लिए थे |
       बाद में अखौरी केदारनाथ जब पूज्य बाबा के दर्शनों में गये तो बाबा ने स्वत: हीं उनसे कहा – “ भक्त तुम तो अब मेरा नाम ले कर बहुत से रोगियों को अच्छा कर देते हो |
.......मैं भी ऐसा हीं कुछ करता हूँ |”
देवरहा बाबा के चरणों में प्रणाम _/\_
साभार : ब्रजकिशोर जी के पुस्तक से प्राप्त  

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

देवरहा बाबा के चमत्कार 18

तप का फल
( देवरहा बाबा का नाम “ देवरहा ” कैसे पड़ा इसकी कथा )
       काफी पहले की बात है | गोरखपुर जनपद का  मईल गाँव सरयू नदी के कटाव का शिकार हो गया था | वहां के किसान खेती की जमीन और घर को घाघरा ( सरयू ) की धारा में समाते हुए देख कर रो रहे थे | योगिराज ग्रामीणों की बिपति देख कर द्रवित हो गए | उन्होंने ग्राम वासियों को आश्वासन दिया – ‘अब सरजू जी कटाव बंद करेंगी | तट पर मेरी कुटिया डाल दो |’
       गाँव वालों ने बाबा की इच्छानुसार तट पर झोपडी डाल दी और बाबा वहीँ तपस्या में लग गये | तप के फलस्वरूप नदी का कटाव बंद हो गया | और धारा की दिशा बदल गयी | इससे प्रभावित हो कर लोग दर्शनों में आने लगे और दियर ( नदी के किनारे का बालू वाला क्षेत्र ) में रहने के कारण बाबा  ‘ दियरहा ’ बाबा कहलाने लगे जो अब कालान्तर में देवरहा बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं |

       सिद्ध योगी हीं नदी पर ऐसा अनुशासन कर सकते हैं | मुहम्मदाबाद ( गाजीपुर ) के निकट एक गाँव है हरिहरपुर | वहां भी पंजाबियों जैसे गठीले बदन वाले एक सिद्ध पुरुष थें | जिन्होंने गाँव वालों को नदी के कटाव से बचाया था | और बदले में सभी ग्राम वासियों को लंगोटी भर जमीन बाबा के कुटिया के लिए छोड़ना पड़ा था | उनकी समाधि ( लगभग  1920 ई ०  ) के बाद जब ग्रामीणों ने शर्त पालन बंद कर दिया तो फिर कटाव जारी हो गया जिसे काशी के किसी सिद्ध संत ने शर्त पालन करा कर नियमित करवाया था |
       देवरहा बाबा का सम्बन्ध नदियों से गहरा रहा है | उनकी जिन्दगी का अधिकाँश समय नदियों के गोद में हीं व्यतीत हुआ  था | | वे उन्हें माँ की तरह मानते थे अत : उनके कथन पर नदियाँ अपनी दिशा बदल लेती थी |
संतों के प्रेम भक्ति के आगे  उताल तरंगें भी  सिर झुका लेती हैं
देवरहा बाबा की जय _/\_

साभार : ब्रजकिशोर जी के पुस्तक से प्राप्त  

सोमवार, 7 सितंबर 2015

तैलंग स्वामी 1

तैलंग स्वामी अक्सर शाम के समय अपने आश्रम ( बनारस ) से चल कर काल भैरव ( बनारस ) दर्शन को आते थे | वापस लौटते वक्त एक दूध वाले के अनुरोध पर उसके यहाँ दूध पीते थे | कहा जाता है कभी कभी कडाही उठा कर बीस सेर दूध पी जाते थे | बाबा के जाने के बाद शेष दूध को ग्राहक  प्रसाद के रूप में खरीद लेते थे | इस प्रकार उस ग्वाले का सारा  दूध बिक जाता था | जब कभी वे इधर नहीं आते थे तो उसकी बिक्री देर रात गये तक होती रहती थी  |
तैलंग स्वामी  का क्रिया कलाप अदभुत था | कभी कडाके की सर्दी में ठंढे पानी से नहाते थे और कभी प्रचंड  गर्मी में तपते रेत पर लेटे रहते थे | मंगलदास भट्ट  के घर में एक बड़ा  गड्ढा था , जिसमे वे बैठ जाते थे और लोग उन पर ठंढा जल झारी से गिराते थे जिस प्रकार शिवलिंग पर झारी से गिराया जाता है | कभी गंगा में स्नान करने गये तो कई घंटे डुबकी लगाये रहते या शवासन करते हुए दिन भर तैरते रहते थे | उनके सोने का तरीका भी विचित्र था | एक कम्बल बिछाते थे और एक दूसरा कम्बल ओढ़ लेते थे |
तैलंग  स्वामी की और भी कथाएँ लेकर पुन : हाज़िर होऊंगा ॐ

साभार : विश्वनाथ मुखर्जी के पुस्तक से प्राप्त  

परावलंबन निषेध ध्यान |

आराम से सुखासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी हो तनी हुई नहीं | निचे बैठने के लिए कोई आसन बिछा लें सूती ऊनी   या कुश का कुछ भी   | ...